Sunday, December 22, 2013

॥ वस्ल-ए-हक़ीक़त ॥

मैंने रोते-रोते ख्वाब लिखा है,
मैंने अपनों का हिसाब लिखा है,
ज़िंदगी फिर एक जुआ ही है,
मैंने फिर अपने को बर्बाद लिखा है॥

मैंने रोते-रोते ख्वाब लिखा है.....

कीस्ती माझी सब थके हुए है,
सागर-नदिया सब किनारे छूट गए है,
अपने प्यारे से सब रूठ गए है,
मैंने फिर भी दिल को अपने आबाद लिखा है॥

मैंने रोते-रोते ख्वाब लिखा है.....


ज़िंदगी का ये दौर वही है,
आंखो मे अब चोर वही है,
कुमलाए नन्हे पैरो का शोर वही है,
रूठे हुए शब्दो का फिर से हिसाब लिखा है॥

मैंने रोते-रोते ख्वाब लिखा है.....

दिवानेपन का वो मंज़र,
मेरे हाथो मे फिर खंजर,
फिर आंखो से गम गिरता शर-शर,
मैंने फिर गिरते-गिरते अपने को नायाब लिखा है॥

मैंने रोते-रोते ख्वाब लिखा है.....

कलम सहारा बन जाती है,
आँख का तारा बन जाती है,
चलते चलते जब भी रुका हूँ,
“महेश” तेरे चलने का सहारा बन जाती है,
फिर लिखते-लिखते सबको आदाब लिखा है॥


मैंने रोते-रोते ख्वाब लिखा है.....

Monday, September 24, 2012

|| कहाँ गयी आजादी ||


कहा गया मेरा चरखा, कहाँ गयी मेरी खादी,
राजघाट का बापू उठके पूछे,
कहाँ गयी आजादी ॥

अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना हो गया क्यो भारी,
पहले गोरे अंग्रेज़ो का शासन था
अब फैल रही काले अंग्रेज़ो की महामारी ||
कहाँ गया.............

कुछ सत्ता के अधिकारी, गठबंधन को बता रहे मजबूरी,
क्यो सर्मसार कर रहे हिन्द को ये कैसी है लाचारी,
मजबूरी जो गठबंधन को बताए,
वो देश छोड़ भाग जाये,
ना करे देश की यू बरबादी॥
कहाँ गया.............

सत्ता की अब सीढ़ी सच्ची,
एक संत को “ठग” बताते है,
कुछ बहरूपिये मेरे हिन्द मे तमाशा रोज दिखाते है,
खुद कुआं खोदते फिर खुद उसमे गिर जाते है,
काली माया जोड़-जोड़ कर विदेशो मे भिजवाते है,
सोई जनता जाग गयी अब किसको मूर्ख बनाते,
महेश हिम्मत है तो खोल बताए,
पूछे सवा करोड़ आबादी ||

कहा गया मेरा चरखा, कहाँ गयी मेरी खादी,
राजघाट का बापू उठके पूछे,
कहाँ गयी आजादी ॥ 

Monday, April 23, 2012

|| सड़ते गणतन्त्र की भूख ||



 सड़ते गणतन्त्र की भूख देखिये,
 आज फिर इस धरती पर सत्ता का प्रतिरूप देखिये || 

 FCI की गलती नहीं!! गरीबो की किस्मत देखिये,
 गोदामों में सड़े अनाज ये न्यूज़ हर घडी देखिये || 

 घोटालो का नहीं अंत, इस पर भी केंद्र शांत, 
 संसद में रोज इन पर एक चक्व्युह देखिये || 

 ३२ रूपये में अमीरी और १९४ करोड़ की फकीरी,
 इस पर भी सियासतदारो का घमंड देखिये || 

 गरीब के मुह पर तमाचे दिन आये दिन लगे,
 तो क्या हुआ "महेश"!
 योजना आयौग का "३२ रूपये" जोरदार तमाचा देखिये ||

Wednesday, October 5, 2011

||32 रुपे में अमीरी||


लूटे हुए आदर्शो पर हम चीख-२ कर रोते है ।
अपने लहू की बूँद जला-२ के दो अन्न के दाने बोते है ॥

पहले जयादा सोचा करता था ।
अपनों का पेट भरने को हर रोज मैं मरता था ॥

सायद मेरी गरीबी में योजना आयोग का एक अहसान हुआ ।
32 रुपे में अमीरी का नया फरमान हुआ ॥

अब मैं पैदल ही घर से चल पड़ता हूँ ।
रिक्शा के भाड़े को लेकर अपनों से लड़ पड़ता हूँ ॥

अब अपनी ३२ रुपे की अमीरी पर घमंड आ जाता है ।
लेकिन ये सब सोचते ही गरीबी का साया फिर से छा जाता है ??

Friday, August 19, 2011

जागो वतन के लोगो भारत माँ नीलाम न हो


फटेहाल जिन्दगी अब ठोर ढूंडती है,
उमीदों के उजाले लेकर एक भोर ढूंडती है,
इन आँखों के उजालो को कोई तो अंगार बनाओ यारो ॥

समेट लो दामन में अपने दर्द,
बुजदिली में जीने से अच्छा है मरो बन के मर्द,
अब पानी के जगह आँखों से खून बहाओ यारो ॥

बहुत सुन लिया संगीत,
बहुत गा चुके फिल्मो के गीत,
अब इस घायल हिन्दुस्तान पे भी कोई गीत बनाओ यारो ॥

जागो वतन के लोगो भारत माँ नीलाम न हो,
इतिहास के पन्नो में देशभक्ति बदनाम न हो,
अपनी छाती पर "महेश" इन्कलाब लिखवाने को तयार रहो,
फिर से भक्तसिंह की फांसी दोहराने को तैयार रहो,
फिर से उधम सिंह बन गलियों में आओ यारो ॥

ये तस्वीर कपटी नेताओ को दिखाओ यारो,
इस घायल हिन्दुस्तान को फिर आजादी दिलाओ यारो,
अपने जिस्म में खून को तब तक ठंडा न होने दो,
जब तक जीत न जाओ यारो ॥ 

Wednesday, June 15, 2011

||"माँ" मेरे जीवन का सम्पूर्ण अर्थ है||


"माँ"
मेरे जीवन का सम्पूर्ण अर्थ है "माँ"
तेरे बिना मेरा जीवन व्यर्थ है माँ ॥

मेरा विस्वास है संवेदना हैं अहसास है माँ,
तेरे सिवा कुछ भी नहीं तू सबसे ख़ास है माँ ॥

मेरे जीवन की धुप है तू ही छाँव है माँ,
गहरे अँधेरे में रौशनी का वास है माँ ॥

रोती हुई आँखों की हिल्लोर है माँ,
बूढी आँखों में उजियारा समेटे एक भोर है माँ ॥

झुलसते खयालो में कोयल की बोली है माँ,
कभी बिंदिया है कुमकुम है रोली है माँ ॥

कभी गंगा है जमुना है कभी सरस्वती है माँ,
मेरे हर दुःख दर्द में साथ चलती है माँ ॥

माँ रोटी है चूल्हा है हाथो का छाला है माँ,
जब गिरा हूँ तुने ही संभाला है माँ ॥

चाँद है सूरज है धरती है माँ,
जाने कितनी बार अपनों के लिए मरती है माँ ॥

झुलसती धुप में छाँव है माँ,
मेरी यादो में बैठा मेरा गाँव है माँ ॥

चोट लगे मुझको तो रोती है माँ,
अपना दर्द भूल मेरे लिए रातो को नहीं सोती है माँ ॥

तू दुनिया में न हो वो दिन कभी न आये माँ,
खुदा से है गुजारिश तू जब भी आवाज दे मुझको खड़ा पाए माँ ॥

मैं अपने जीवन की ये कविता "माँ" के नाम करता हूँ,
मैं “दुनिया” की हर "माँ" को सलाम करता हूँ ॥