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Monday, April 23, 2012

|| सड़ते गणतन्त्र की भूख ||



 सड़ते गणतन्त्र की भूख देखिये,
 आज फिर इस धरती पर सत्ता का प्रतिरूप देखिये || 

 FCI की गलती नहीं!! गरीबो की किस्मत देखिये,
 गोदामों में सड़े अनाज ये न्यूज़ हर घडी देखिये || 

 घोटालो का नहीं अंत, इस पर भी केंद्र शांत, 
 संसद में रोज इन पर एक चक्व्युह देखिये || 

 ३२ रूपये में अमीरी और १९४ करोड़ की फकीरी,
 इस पर भी सियासतदारो का घमंड देखिये || 

 गरीब के मुह पर तमाचे दिन आये दिन लगे,
 तो क्या हुआ "महेश"!
 योजना आयौग का "३२ रूपये" जोरदार तमाचा देखिये ||

Monday, July 26, 2010

॥ अधूरी नज़्मे ॥

1)
मेरी नाकामी मुझ पे हस्ती और सहारे छुट गए.
अब मेरी ज़ीस्त के सब किनारे टूट गए,
हम जला के चिराग बाम पर बैठे रहे,
पर जलने वाले सब चिराग हमसे रूठ गए ||

2)
जो कभी ख़त्म ना हो
ये महफिलों के दोर यूहीं चलतें रहे
जीस्त जवानी और जान के फैंसले
फिर अपने लहू से धुलते रहे
हो गैर मुमकिन अगर जिन्दगी लुटानी पड़े
की गहराइयों के समुंदर फिर पलते रहे ||

3)
मेरी मौत पे रोये वो जो गैर हो
मुझे कंधा वो दे जिनसे बैर हो
सुकून मिलेगा मेरी रूह को,
वर्ना छोड़ देना मुझे उस जगह
जहाँ तनहाइयों का कहर हो ||