"गरीबी में सास लेता, फिर अपने दिल को भाप लेता,
कभी दिन को मैं सोता, कभी रातों को जाग लेता,
गरीबी बड़ी जहरीली नागिन है साहब,
आदमी के जिस्म तो क्या ये रूह को भी डस लेती है"
एक मजदूर.....
न जात न पात न कोई "धर्म" न "मज़हब",
न कोई किसी से द्वेष न कोई परिवेश,
न कोई अहम सिर्फ पेट भरने का वहम,
नम्रता से झुका सर,हर बात में जी हजूर,
एक मजदूर...........
नक्शे-ऐ गुलिस्तान को स्वरुप में ढाल देना,
"क़ुतुबमीनार" से "ताजमहल" तक एक पत्थर से नाम देना,
बहुतों के महल बुलंद है,इनकी बुनियाद में इनके झोपड़े दबे हुए है,
के सायद आज भी,इनके हाथ कटे पड़े है,
माथे से टपकता पसीना,आंखे नम पड़ी है,
उसके चहरे पे ना जा, रूह में दीखता है नूर,
एक मजदूर.............
बुलंदियों के परबत पर बैठे,कैसे देखोगे इन्हें,
तुम्हारा ये मजदूर घाटी में खड़ा है,
हालात बदल सकते हो तुम इनके,
इनमे ना सही तुममे तो सुखार्ब जड़ा है,
तुमसे इनाम नहीं मागा इन्होने,दिहाड़ी मांगी है साहब,
तुम्हारा मिजाज़ फिर क्यों उखड़ा पड़ा है,
दिहाड़ी दो न साहब, क्यों बनते हो इतने क्रूर,
एक मजदूर.....................
अब बस मेरा ज़मीर रो रहा है साहब,
मैं तुमसे ज्यादा महनतकस हूँ,
फिर भी मेरे पास रोटी न कपडा न मकान है साहब,
अछी महक से महकती है तुम्हारी रसोई,
मेरा तो चूल्हा भी ठंडा पड़ा है ,
"महेश" पत्थर से तेरा कांच का महल तोड़ देता,
मगर मेरा हाथ पेट ने पकड़ा हुआ है,
इसीलिए सर झुकाए खड़ा हूँ,
कुछ तो रहम करो हूजूर,
एक मजदूर.....................
"Mahesh Yadav"
Monday, October 11, 2010
Friday, October 1, 2010
"मंदिर" हो वहा या "मस्जिद" हो वहा,
"मंदिर-मस्जिद" के हवालो से निकले है हवा,
क्यों उसे दुआ मिले मिल रही है बददुआ,
सयंम की कमान मैंने बाधे रखी,
फिर भी दिलो का मैल कम न हुआ,
यू तो जले है पहले भी आशियाँ बहुत,
मगर आज उस मालिक के दर से भी निकला धुआ...
क्या ये जरूरी है के "मंदिर" हो वहा या "मस्जिद" हो वहा,
सायद अब इन्ही से जाना जाता है जहाँ,
कोन समझाए-कोन उन्हे ये बताये,
वो मालिक एक है और एक है ये जहाँ,
के "मंदिर-मस्जिद-गुरद्वारो" और "चर्च" में बटा हुआ ये जहा,
नदियाँ, झील-समंदर समझ गए सब,
मगर नहीं समझा इंसां...
अगर एक सवाल पूछे हमसे खुदा,
की मैंने पहले "धर्म" "कर्म" बनाये या बनाया तुझे अ इंसां,
की तुझे इस जहाँ में लाने की है ये सजा,
मुझे चार हिस्सों में बाँट दिया,
मैने कभी इस मात्रभूमि को चूमा था,
इसकी रज में लोट कर मैं हुआ बड़ा,
मैने कभी किसी में कोई फर्क नहीं समझा,
फिर भी तुमने इस जहा में मुझको बाट दिया...
लड़ते हो बेगैरत बुजदिलो की तरह,
अरे मैं तो द्वापर सत त्रेता में भी एक ही था,
इस कलयुग में फिर तुमने मुझको बाँट दिया,
संसकिरती को पीछे छोड़ा और सभ्यताओं का नास किया,
अ इंसां क्यों विनास की रहा में तुने कदम रखा,
फिर मैं आऊं ध्वजा दिखाऊ, के उन वीरो को तुमने भुला दिया,
देश प्रेम और भाई चारे का नाम नहीं,
अ मुर्ख तुने "भगवान्" को भी दूजा बना दिया,
के आँखों में बंद कर उजियारे को,
अंधियारे को पल में हटा,
फिर दिल से बोल तू एक था एक है एक ही रहेगा सदा.....
क्यों उसे दुआ मिले मिल रही है बददुआ,
सयंम की कमान मैंने बाधे रखी,
फिर भी दिलो का मैल कम न हुआ,
यू तो जले है पहले भी आशियाँ बहुत,
मगर आज उस मालिक के दर से भी निकला धुआ...
क्या ये जरूरी है के "मंदिर" हो वहा या "मस्जिद" हो वहा,
सायद अब इन्ही से जाना जाता है जहाँ,
कोन समझाए-कोन उन्हे ये बताये,
वो मालिक एक है और एक है ये जहाँ,
के "मंदिर-मस्जिद-गुरद्वारो" और "चर्च" में बटा हुआ ये जहा,
नदियाँ, झील-समंदर समझ गए सब,
मगर नहीं समझा इंसां...
अगर एक सवाल पूछे हमसे खुदा,
की मैंने पहले "धर्म" "कर्म" बनाये या बनाया तुझे अ इंसां,
की तुझे इस जहाँ में लाने की है ये सजा,
मुझे चार हिस्सों में बाँट दिया,
मैने कभी इस मात्रभूमि को चूमा था,
इसकी रज में लोट कर मैं हुआ बड़ा,
मैने कभी किसी में कोई फर्क नहीं समझा,
फिर भी तुमने इस जहा में मुझको बाट दिया...
लड़ते हो बेगैरत बुजदिलो की तरह,
अरे मैं तो द्वापर सत त्रेता में भी एक ही था,
इस कलयुग में फिर तुमने मुझको बाँट दिया,
संसकिरती को पीछे छोड़ा और सभ्यताओं का नास किया,
अ इंसां क्यों विनास की रहा में तुने कदम रखा,
फिर मैं आऊं ध्वजा दिखाऊ, के उन वीरो को तुमने भुला दिया,
देश प्रेम और भाई चारे का नाम नहीं,
अ मुर्ख तुने "भगवान्" को भी दूजा बना दिया,
के आँखों में बंद कर उजियारे को,
अंधियारे को पल में हटा,
फिर दिल से बोल तू एक था एक है एक ही रहेगा सदा.....
Tuesday, September 28, 2010
बचपन कभी भुलाया नहीं मैने तुम्हे..
बचपन कभी भुलाया नहीं मैने तुम्हे..
अपनी यादों में कभी भी सुलाया नहीं मैने तुम्हे..
के सायद मैं कभी सोया ही नहीं,
मुझे याद क्यों न हो,स्कूल से भाग कर क्रिकेट खेलने जाना,
फिर पिटाई के डर मास्टर को झूट बोल पेट में दर्द बताना..
`बहुत दिन हुए नहिं देखा दस पैसे का सिक्का...
स्कूल के दरवाज़े पर खड़े होकर चोहान के
गोल्गपे नहीं खाए,
बहुत दिन हुए आंगन के चूल्हे पर हाथ तापे..
याद नहीं आखरी बार कब डरे थे अँधेरे से...
कब झूले थे आखरी बार, पेड़ की डाली पर...
कब छोडा था चाँद का पीछा करना..
याद नहीं, कब कह दिया रहड़ी वाले
भैया की गोला गिरी को अलविदा..!!
कहाँ छुट गए कांच की चूडियों के टुकड़े,
माचिस की डिबिया की तास, चिकने पत्थरों की जागीर..
कब सुना था आखरी बार, स्कूल की घंटी का मीठा सुर...
बहुत दिन हुए नहीं खाई माँ की डाट...
...बसता पटक के भाग गया था खेलने...
नहीं लौटा है अब तक शाम ढलने को है,
सच नहीं लोटा मेरा बचपन जिन्दगी अपने सफ़र पर चलने को है...
के मेरी जिन्दगी के दिन हैं कितने बचे......
बचपन कभी भुलाया नहीं मैने तुम्हे..
अपनी यादों में कभी भी सुलाया नहीं मैने तुम्हे.. (Mahesh Yadav)
अपनी यादों में कभी भी सुलाया नहीं मैने तुम्हे..
के सायद मैं कभी सोया ही नहीं,
मुझे याद क्यों न हो,स्कूल से भाग कर क्रिकेट खेलने जाना,
फिर पिटाई के डर मास्टर को झूट बोल पेट में दर्द बताना..
`बहुत दिन हुए नहिं देखा दस पैसे का सिक्का...
स्कूल के दरवाज़े पर खड़े होकर चोहान के
गोल्गपे नहीं खाए,
बहुत दिन हुए आंगन के चूल्हे पर हाथ तापे..
याद नहीं आखरी बार कब डरे थे अँधेरे से...
कब झूले थे आखरी बार, पेड़ की डाली पर...
कब छोडा था चाँद का पीछा करना..
याद नहीं, कब कह दिया रहड़ी वाले
भैया की गोला गिरी को अलविदा..!!
कहाँ छुट गए कांच की चूडियों के टुकड़े,
माचिस की डिबिया की तास, चिकने पत्थरों की जागीर..
कब सुना था आखरी बार, स्कूल की घंटी का मीठा सुर...
बहुत दिन हुए नहीं खाई माँ की डाट...
...बसता पटक के भाग गया था खेलने...
नहीं लौटा है अब तक शाम ढलने को है,
सच नहीं लोटा मेरा बचपन जिन्दगी अपने सफ़र पर चलने को है...
के मेरी जिन्दगी के दिन हैं कितने बचे......
बचपन कभी भुलाया नहीं मैने तुम्हे..
अपनी यादों में कभी भी सुलाया नहीं मैने तुम्हे.. (Mahesh Yadav)
Sunday, September 12, 2010
मैंने कभी सोचा नहीं
मैंने कभी सोचा नहीं, के ये दोर भी आयेंगे,
के बदनाम होंगे बददुआये मिलेंगी,
और सिर्फ मेरी झोली में कांटे नज़र आएँगे !!
मैंने तो चाहा था फूलों सा चमन,
नसीबा भी ऐसा जैसे खिलता कमल,
नहीं थी खबर के मिलेंगे यू कफ़न,
के गुस्ताखियों के खेल यू खेले जायेंगे !
के मेरे सपनो के खिलोने सारे मेले में छुट जायेंगे !!
मैंने कभी सोचा नहीं..................
के सायद मैंने अपने आपको पत्थर बना लिया था,
के तकदीर ने लड़ते-२ जीना सिखा दिया था,
तभी तो मेरे जख्म खुले के खुले रह गए,
जो गैरों से मिले वो तो सी गए,
जो अपनों से मिले वो जख्म हरे रह गए,
के मुझे क्या पता था मुक्कदर से इस कदर टकरायेंगे !
के रुस्वाइयां मिलेंगी, और हम अकेले रह जायेंगे !!
मैंने कभी सोचा नहीं..................
मैंने हर गम पीने की कोशिश की,
मैंने हर जख्म सिने की कोशिश की,
मैं हर दोर में करता रहा खुद से बेवफाई,
मगर मेरा विस्वास मेरी सच्चाई काम न आई,
सायद उस खुदा को मंज़ूर न था के मुझे मिलनी ही थी रुसवाई,
के मैं इतना बुरा भी ना था की यू ठुकरा दिए जायेंगे !
के इस नीले गगन के नीचे मेरे लिए तनहाइयों के बादल नज़र आयेंगे !!
मैंने कभी सोचा नहीं.................
जब तक मैं समझ पाता दुनिया के फैसले,
मेरी आँखों पे पड़े थे यारो के काफिले,
विस्वास बहुत था मुझे अपनों पर,
मगर वो भी मुझे गैरों की भीड़ में खड़े मिले,
के सायद अब लोग सोह्रतों से पहचाने जायेंगे !
मुझ जैसे लोग भीड़ में अकेले नज़र आयेंगे !!
मैंने कभी सोचा नहीं..............
के बदनाम होंगे बददुआये मिलेंगी,
और सिर्फ मेरी झोली में कांटे नज़र आएँगे !!
मैंने तो चाहा था फूलों सा चमन,
नसीबा भी ऐसा जैसे खिलता कमल,
नहीं थी खबर के मिलेंगे यू कफ़न,
के गुस्ताखियों के खेल यू खेले जायेंगे !
के मेरे सपनो के खिलोने सारे मेले में छुट जायेंगे !!
मैंने कभी सोचा नहीं..................
के सायद मैंने अपने आपको पत्थर बना लिया था,
के तकदीर ने लड़ते-२ जीना सिखा दिया था,
तभी तो मेरे जख्म खुले के खुले रह गए,
जो गैरों से मिले वो तो सी गए,
जो अपनों से मिले वो जख्म हरे रह गए,
के मुझे क्या पता था मुक्कदर से इस कदर टकरायेंगे !
के रुस्वाइयां मिलेंगी, और हम अकेले रह जायेंगे !!
मैंने कभी सोचा नहीं..................
मैंने हर गम पीने की कोशिश की,
मैंने हर जख्म सिने की कोशिश की,
मैं हर दोर में करता रहा खुद से बेवफाई,
मगर मेरा विस्वास मेरी सच्चाई काम न आई,
सायद उस खुदा को मंज़ूर न था के मुझे मिलनी ही थी रुसवाई,
के मैं इतना बुरा भी ना था की यू ठुकरा दिए जायेंगे !
के इस नीले गगन के नीचे मेरे लिए तनहाइयों के बादल नज़र आयेंगे !!
मैंने कभी सोचा नहीं.................
जब तक मैं समझ पाता दुनिया के फैसले,
मेरी आँखों पे पड़े थे यारो के काफिले,
विस्वास बहुत था मुझे अपनों पर,
मगर वो भी मुझे गैरों की भीड़ में खड़े मिले,
के सायद अब लोग सोह्रतों से पहचाने जायेंगे !
मुझ जैसे लोग भीड़ में अकेले नज़र आयेंगे !!
मैंने कभी सोचा नहीं..............
Wednesday, September 8, 2010
मेरी मोहब्बत के किस्से जब मेरी आँखों से बयां होने लगे
मेरी मोहब्बत के किस्से जब मेरी आँखों से बयां होने लगे,
बाते हुई चर्चे हुये फिर हर गली में बदनाम हम होने लगे,
सायद जमाने वालो को नागवार गुजरी ये बाते,
के आज वक़्त ये है, हम जुदा है,
के बस यादों के गहरे साए में अपने आप को छुपाने लगे,
के सायद मेरी दीवानगी में कुछ गम छुपे थे,
जो की अब रह-रह के मेरी आँखों से बहने लगे,
लहरों की तरह चंचल मैं उन्मुक्त हवाओ से किनारे दर किनारे चलता रहा,
गलत मेरा विस्वास हुआ किनारे भी अब टूटने लगे,सहारे भी अब छुटने लगे,
के मैं अपनी अक्लमंदी पर विचारो पर भरोसा करता रहा,
के मेरे विचार भी अब मैखाने में दम तोडने लगे,
मुझे विस्वास था उस दुनिया के मालिक पर,
के वक़्त दर वक़्त उस पर से भी विस्वास टूटने लगे,
मुझे गम नहीं की मौत ही मेरी मंजिल सही,
के बस अब तो उनकी यादों में ये सांस भी छुटने लगे,
के अब 'महेश' तेरी जीस्त के सब किनारे टूटने लगे!!
बाते हुई चर्चे हुये फिर हर गली में बदनाम हम होने लगे,
सायद जमाने वालो को नागवार गुजरी ये बाते,
के आज वक़्त ये है, हम जुदा है,
के बस यादों के गहरे साए में अपने आप को छुपाने लगे,
के सायद मेरी दीवानगी में कुछ गम छुपे थे,
जो की अब रह-रह के मेरी आँखों से बहने लगे,
लहरों की तरह चंचल मैं उन्मुक्त हवाओ से किनारे दर किनारे चलता रहा,
गलत मेरा विस्वास हुआ किनारे भी अब टूटने लगे,सहारे भी अब छुटने लगे,
के मैं अपनी अक्लमंदी पर विचारो पर भरोसा करता रहा,
के मेरे विचार भी अब मैखाने में दम तोडने लगे,
मुझे विस्वास था उस दुनिया के मालिक पर,
के वक़्त दर वक़्त उस पर से भी विस्वास टूटने लगे,
मुझे गम नहीं की मौत ही मेरी मंजिल सही,
के बस अब तो उनकी यादों में ये सांस भी छुटने लगे,
के अब 'महेश' तेरी जीस्त के सब किनारे टूटने लगे!!
Friday, August 20, 2010
हम किसी की बात का अक्सर गिला करते नहीं
हम किसी की बात का अक्सर गिला करते नहीं,
लोग ही कुछ इस तरह के हैं हया करते नहीं!
खुद नहीं आता किसी के साथ मिलकर बैठना,
और फिर लोगो से कहते वो वफा करते नहीं!
ओ मुसाफिर! गिर गया तो क्या हुआ उठ फिर संभल,
इस कदर मंजिल के दीवाने गिरा करते नहीं!
वो बसर डरते ही रहेंगे अपनी ही परछाई से,
जो कभी दो चार मुस्किल से हुआ करते नहीं!
शौक जिनके दिल में हैं, खुद भी तो एक मंजिल हैं वो,
वो किसी की रहा का कांटा बना करते नहीं!
दोस्तों को नाज़ क्यों न हो "महेश" की दोस्ती पर,
हम तो अपने दुसमन का भी बुरा करते नहीं!!
लोग ही कुछ इस तरह के हैं हया करते नहीं!
खुद नहीं आता किसी के साथ मिलकर बैठना,
और फिर लोगो से कहते वो वफा करते नहीं!
ओ मुसाफिर! गिर गया तो क्या हुआ उठ फिर संभल,
इस कदर मंजिल के दीवाने गिरा करते नहीं!
वो बसर डरते ही रहेंगे अपनी ही परछाई से,
जो कभी दो चार मुस्किल से हुआ करते नहीं!
शौक जिनके दिल में हैं, खुद भी तो एक मंजिल हैं वो,
वो किसी की रहा का कांटा बना करते नहीं!
दोस्तों को नाज़ क्यों न हो "महेश" की दोस्ती पर,
हम तो अपने दुसमन का भी बुरा करते नहीं!!
Tuesday, August 17, 2010
.....कुछ बीते लम्हे.....
कुछ बीते लम्हे जब मुझे याद आते हैं !
तो वो मेरे जहन को सुलगा जाते हैं !!
वक़्त दर-बदर आगे निकलता जाता हैं !
और पीछे किस्से रह जाते हैं !!
के जिन्दगी जैसे उन लम्हों में आज भी कट रही है,
के जैसे रात की चादर, सुबह की धुप से छट रही हैं,
नाउम्मीदी के साए का, फिर वो दोर याद आता है,
के मुझे यकीं ना हो फिर मेरे सपने अधूरे रह जाते हैं!
कुछ बीते लम्हे...............
के मैं चल पड़ता हूँ जाने किस सफ़र पर,
के कभी चलता हूँ रुक जाता हूँ, मैं खुद को रोक नहीं पाता हूँ,
के नाकामी मेरे पीछे भाग रही हो,
के बुजदिली मेरी तरफ झांक रही हो,
के फिर अजब सी बेचैनी के मंज़र मेरे सिने में उतरते जाते हैं!
कुछ बीते लम्हे.................
के जिन्दगी जैसे सपनो का रेला हैं,
और आदमी हर दोर में फिर अकेला है,
मैं फिर इस अकेलपन से घबराता हूँ,
मैं जैसे अपने पथ को भूलता जाता हूँ,
के इस सूनेपन से मेरे साए भी घबराते हैं!!
कुछ बीते लम्हे.....................
मैं खामोसी में सन्नाटे की आहट को जब सुनता हूँ,
फिर अपने जहन में जाने कितने ख्वाबो को मैं बुनता हूँ,
ख्वाबो की हकीक़त यादों में रह जाती है,
पलके उठाते ही फिर रात अंधियारी नज़र आती हैं,
फिर ख्वाबो के सारे किस्से आँखों से बह जाते हैं!!
कुछ बीते लम्हे.....................
अपने भी अब दूर हुए,
फिर सपने भी अब सब चूर हुए,
क्यों अपनों की महफिल में आज इतने मजबूर हुए,
सायद मुझमे ऐसी कोई बात नहीं,
के आज कोई मेरे साथ नहीं,
के आज मेरे अपने भी मुझसे कतराते हैं!!
कुछ बीते लम्हे....................
तो वो मेरे जहन को सुलगा जाते हैं !!
वक़्त दर-बदर आगे निकलता जाता हैं !
और पीछे किस्से रह जाते हैं !!
के जिन्दगी जैसे उन लम्हों में आज भी कट रही है,
के जैसे रात की चादर, सुबह की धुप से छट रही हैं,
नाउम्मीदी के साए का, फिर वो दोर याद आता है,
के मुझे यकीं ना हो फिर मेरे सपने अधूरे रह जाते हैं!
कुछ बीते लम्हे...............
के मैं चल पड़ता हूँ जाने किस सफ़र पर,
के कभी चलता हूँ रुक जाता हूँ, मैं खुद को रोक नहीं पाता हूँ,
के नाकामी मेरे पीछे भाग रही हो,
के बुजदिली मेरी तरफ झांक रही हो,
के फिर अजब सी बेचैनी के मंज़र मेरे सिने में उतरते जाते हैं!
कुछ बीते लम्हे.................
के जिन्दगी जैसे सपनो का रेला हैं,
और आदमी हर दोर में फिर अकेला है,
मैं फिर इस अकेलपन से घबराता हूँ,
मैं जैसे अपने पथ को भूलता जाता हूँ,
के इस सूनेपन से मेरे साए भी घबराते हैं!!
कुछ बीते लम्हे.....................
मैं खामोसी में सन्नाटे की आहट को जब सुनता हूँ,
फिर अपने जहन में जाने कितने ख्वाबो को मैं बुनता हूँ,
ख्वाबो की हकीक़त यादों में रह जाती है,
पलके उठाते ही फिर रात अंधियारी नज़र आती हैं,
फिर ख्वाबो के सारे किस्से आँखों से बह जाते हैं!!
कुछ बीते लम्हे.....................
अपने भी अब दूर हुए,
फिर सपने भी अब सब चूर हुए,
क्यों अपनों की महफिल में आज इतने मजबूर हुए,
सायद मुझमे ऐसी कोई बात नहीं,
के आज कोई मेरे साथ नहीं,
के आज मेरे अपने भी मुझसे कतराते हैं!!
कुछ बीते लम्हे....................
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